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Showing posts from March, 2018

स्वयंवर और विवाह

जो कन्या विवाह योग्य हो जाती है, उसका विवाह उसके माता-पिता और सगे संबंधियों द्वारा योग्य विवाह योग्य वर से कर दिया जाता है। स्वयंवर तो राजकन्याओं का होता था, शायद राजकन्याओं को इसके लिए योग्य शिक्षा भी मिलती हो। साधारण परिवार के लोगों में विवाह परिवार में सबकी सहमति से होता था और आज भी होता है। आजकल स्वयंवर नहीं होता है। कन्या का विवाह योग्य होना मतलब शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक आदि स्तरों पर विकसित होकर संपूर्ण जीवन किसी योग्य पुरुष के साथ जीने का निर्णय लेने की क्षमता से है।  जो कन्या अपना संपूर्ण जीवन सौपने को तैयार हो गयी है उसे अपनी पसंद का योग्य वर अपनी कसौटी से चुनने की अनुमति होती थी, उसे स्वयंवर कहा जाता था। शायद विदेशी आक्रमणों और राजा महाराजाओं आपसी लड़ाईयों के चलते कन्याओं की स्वयंवर की स्वतंत्रता को विराम मिल गया हो। सीताजी और द्रौपदी के स्वयंवर में एक बात समझ में आती है कि उन्हें सामर्थ्य, परिवार और गुणों के आधार पर ही अपने वर को चुना था। जीवन में उनके कष्ट भी आये लेकिन उन्हें कभी अपने परिवार से शिकायत नही रही। परंतु  समय बदला और अब माता-पिता जिसे योग्य समझत...