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स्वयंवर और विवाह

जो कन्या विवाह योग्य हो जाती है, उसका विवाह उसके माता-पिता और सगे संबंधियों द्वारा योग्य विवाह योग्य वर से कर दिया जाता है।
स्वयंवर तो राजकन्याओं का होता था, शायद राजकन्याओं को इसके लिए योग्य शिक्षा भी मिलती हो। साधारण परिवार के लोगों में विवाह परिवार में सबकी सहमति से होता था और आज भी होता है।
आजकल स्वयंवर नहीं होता है। कन्या का विवाह योग्य होना मतलब शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक आदि स्तरों पर विकसित होकर संपूर्ण जीवन किसी योग्य पुरुष के साथ जीने का निर्णय लेने की क्षमता से है। 
जो कन्या अपना संपूर्ण जीवन सौपने को तैयार हो गयी है उसे अपनी पसंद का योग्य वर अपनी कसौटी से चुनने की अनुमति होती थी, उसे स्वयंवर कहा जाता था। शायद विदेशी आक्रमणों और राजा महाराजाओं आपसी लड़ाईयों के चलते कन्याओं की स्वयंवर की स्वतंत्रता को विराम मिल गया हो। सीताजी और द्रौपदी के स्वयंवर में एक बात समझ में आती है कि उन्हें सामर्थ्य, परिवार और गुणों के आधार पर ही अपने वर को चुना था। जीवन में उनके कष्ट भी आये लेकिन उन्हें कभी अपने परिवार से शिकायत नही रही। परंतु  समय बदला और अब माता-पिता जिसे योग्य समझते उसीके साथ कन्या का विवाह कर देते हैं। 
अपने मन, पात्रता और गुणों की अपेक्षा अपने परिवार का हित सोचकर कन्याएं कुछ विरोध न करके विवाह करने के लिए बाध्य होने लगी। कुछ लड़कियां तो केवल विवाह योग्य उम्र होने के कारण ही ब्याही जाने लगी, जबकि वे मानसिक तौर पर विवाह योग्य नहीं हो। विवाह के बाद में जब कभी अपनी कल्पना का पुरुष उन्हें अपने पति में न दिखाई दे तो दुखी होना स्वाभाविक है। स्त्रियों मे यह महानता है कि वह सारी परिस्थितियों को स्वीकार कर और सबकुछ सहन करके भी परिवार की खुशी के लिए बहुत कुछ त्याग कर देती है। परंतु जब कभी जीवन में उसे किसी और में वह सारे गुण दिखाई देने लगे तब वह परंपराओं के चलते अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर लेती है।
जो नियंत्रण नही कर पाती वह विवाहेतर संबंध में सुख ढुंढने की कोशिश करती है परंतु परिवार की जिम्मेदारीयां और नैतिकता के चलते फिर दुखी हो जाती है। 
हमारी विवाह पद्धतियों में जो थोपने का रिवाज बन गया इसीके चलते अनैतिकता पनपती गयी। दोष सिर्फ ना समझी का है। अपने इच्छानुसार पुरुषोंको अनेक विवाह करने की अनुमति प्राचीन काल में रही होगी, परंतु जिम्मेदारी का वहन यह मुख्य उद्देश्य पुरुषों के लिए था। परिस्थितियों के चलते स्वयंवर प्रथा खत्म होकर विवाह की नई यंत्रणा खडी हो गयी।
स्वयंवर में केवल वही पुरुष जाते थे जो कन्या को पसंद करता हो और अपने आप को उस कन्या के योग्य मानते हो। विवाह प्रथा में तो माता, पिता, भाई, भाभी, चाचा, चाची न जाने और कौन-कौन अपनी अपने विचार रखते है जिससे लडकी की पसंद नापसंद गौण हो जाती है। सीताजी भगवान राम के साथ वनवास गयी लेकिन राजा जनक ने कोई दखलंदाजी नही की, द्रौपदी को भी बहुतसे कष्ट उठाने पडे लेकिन मायके वालों ने कभी दखलंदाजी नही की। अब विवाह प्रथा में तो दखलंदाजी का रिवाज ही हो गया। लडकी के वैवाहिक जीवन पर भी मानो अब ससुराल और मायका दोनों का अधिकार होने लगा। 
वैवाहिक सुख केवल ऐशो-आराम से नहीं बल्कि हर परिस्थितियों में साथ निभाने और एकात्मता का अनुभव करने से होता है। परिस्थितियों और सामाजिक रचनाओं में सुसंवादिता बिगडने का कारण है स्वतंत्रता को न समझते हुए स्वतंत्रता का दुरुपयोग करना। स्त्रियों और पुरुषों को स्वतंत्रता देना आवश्यक है लेकिन उसके लिए वह योग्य बने ऐसी परिस्थितियों का सृजन करना सभी की जिम्मेदारी है। 

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