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हिन्दू धर्म श्रेष्ठ क्यों हैं?

जीवन को श्रेष्ठ तरीकों से जीने के लिए कुछ विचारों को जीवन पर्यंत सींचना पडना है। सभी को अपनी तरह से जीवन जीने का अधिकार है परन्तु दूसरे किसी भी जीव के अधिकारों का हनन करके सिर्फ अपने ही जीवन की भलाई सोचना यह स्वार्थ है। प्रकृति की सुसंवादिता बनाए रखने के लिए श्रेष्ठ विचारों का संकलन मन, वचन और कर्म से करते रहना ही धर्म है। जो धारण करने योग्य है वही धर्म है।
परन्तु समय परिवर्तन, परिस्थितियाँ और सामाजिक उथल-पुथल में धर्म को समझना और अधर्म से बचना लोगों के लिए कठिन बनने लगता है जबकि ऐसा है नहीं। धर्म और अधर्म ये दो ही संकल्पनांए है परन्तु आज के समय में धर्म को गलत अर्थ से देखा जा रहा है। पूजा पाठ करनेवाले धार्मिक और न करनेवाले नास्तिक इस प्रकार लोगों की समझ बन गई है। अल्लाह, ईसा मसीह और न जाने कितने ही ईश्वर हमने बना दिए और फिर ईस्लाम, ईसाई, जैन, सीख ऐसे धर्म भी बना दिये। धर्म का धारणा से, धृति अर्थात बुद्धि से और धरती अर्थात देश से सीधा संबंध है। जो जिस देश काल और परिस्थिति में रहेगा उसे उस सुसंवादिता को बनाए रखने के लिए श्रेष्ठ कर्मों को और विचारों को जीना पडेगा। यही कारण है कि हिन्दूस्थान इस भूभाग पर जो धारण करने योग्य परंपरा, संस्कृति और विचारधारा बनी उसे हिन्दू धर्म कहा गया। ईसाई धर्म ने ईसा मसीह की भूमि से जन्म लिया तो ईस्लाम ने मुहम्मद की धरती से।
स्वामी विवेकानंदजी ने कहा कि, 'गर्व से कहो हम हिन्दू है'। क्यों? इसलिए कि हिन्दू धर्म ही वास्तविक 'धर्म' है। हिन्दू शब्द तो मात्र भारत देश का, हिन्दूस्थान का प्रतीकात्मक है। इस देश में अनेको ज्ञानी, विज्ञानी और विचारकों ने अनेको ग्रंथ लिखे जो इस सुसंवादिता तो बनाए रखते है उन ज्ञानीयों और विज्ञानियों को हम ॠषि कहते है। हिन्दू धर्म सिर्फ मंदिरों तक ही सीमित नहीं है यह वही धर्म है जो जीवन के आदि से लेकर मृत्यु के पश्चात तक साथ देता है।
वेद ही धर्म के मूल में है- वेदोऽखिलो धर्म मुल। 'वेद' शब्द संस्कृत भाषा के विद् शब्द से बना है। इसी धातु से 'विदित' (जाना हुआ), 'विद्या' (ज्ञान), 'विद्वान' (ज्ञानी) जैसे शब्द आए हैं। अब जब धर्म के मूल में ज्ञान है जो अनेक ॠषियों द्वारा परखा गया है और हर एक व्यक्ति को परखने का अवसर भी देता है। इतना ही नहीं यह 'ज्ञान' ही स्थल काल और परिस्थितियों के अनुसार मार्गदर्शन भी करता है।
वेद चार है - १. ॠग्वेद - इस वेद में ऐसे ऐसे शब्द हैं जिसे समझने के लिए शब्दकोशों की जरुरत पडेगी। 'निघंटु' और 'निरुक्त' इन ग्रंथों का निर्माण ॠग्वेद समझने के लिए हुआ। इस वेद का ज्ञान ॠषियों ने अपने प्रयास से प्राप्त किया। विश्वामित्र, वामदेव, अत्री, भारद्वाज, वशिष्ठ, कण्व,अंगीरस और अन्य अनेक ॠषियों द्वारा यह ॠग्वेद प्रकट हुआ है। इन ॠषियों को मंत्रदृष्टा कहा गया क्योंकि ज्ञान को उन्होंने देखा। मंत्रकर्ता नही बल्कि मंत्रदृष्टा कहलाये।
स्त्रियों को भी वेद पढने का अधिकार था, जनेऊ पहनने का भी अधिकार था ऐसा इस वेद से मालूम होता है। इस समय में स्त्रियों को बंधन नहीं थे। मनुस्मृति में भी इसका उल्लेख आता है - पुराकल्पे कुमारीणशं मौजी बंधन मिष्यते।
इस वेद में ३३ प्रकार के देवताओं का वर्णन आता है। ३३ कोटि देवता अर्थात ३३ प्रकार के देवता।
११ स्वर्ग के देवता - सूर्य, द्यौ (विद्युत), वरुण, मित्र, सवितु, पुषन, विष्णु, विवस्वान, आदित्य, उषस्, और अश्विन।
११ पृथ्वी के देवता - अग्नि, पृथ्वी, ब्रह्मणस्पति, धेनु, सोम, औषधी, वास्तोष्पती, इडा, ऋत, ऋतु, और रात्रि।
११ अंतरिक्ष के देवता- इंद्र, त्रित, अपान्नपात, मातरिश्वन, अहिर्बुध्न, अजैकपाद, रुद्र, मरुत, वायु, पर्जन्य, और आप।
आज के समय में कितने ही देवता लुप्त हो गए और अन्य देवताओं की भीड़ हो चुकी है। इन सब बातों को तात्विक कार्यकारणभाव से  समझना आवश्यक है।
वेदकाल में समाजस्थिति जाती आधारित नही बल्कि वर्ण आधारित थी जो गुण और कर्म के आधार से तय होती थी। (चातुर्वर्ण्यं मयासूक्तं गुणकर्म विभागशः)। यही कारण था कि दरिद्र और ज्ञानहिन कुल में जन्म लेने के पश्चात भी स्त्री और पुरुष अपने कतृत्व के बल पर राजा, महाराजा, पंडीत, ज्ञानी, ॠषि आदि श्रेष्ठ पदों को प्राप्त कर पाते थे।
ऋग्वेद के मंडल १०, सूक्त ८५ के अनुसार बालविवाह प्रथा उस समय नहीं थी। कन्याओं को प्रौढत्व और समझ आनेपर उनकी संमती से विवाह किया जाता था। मद्य, द्युत, स्वैर वर्तन के लिए शासन था और ऐसा करनेवालों की समाज में निंदा की जाती थी। ६४ प्रकार की कलाओं को सिखाया जाता था जिसमें मकान, भवन, कुएं, पुल ई. बनाना, गीत, वाद्य, नृत्य ई. का समावेश होता था। राजसत्ता क्रुर नहीं परंतु अपने प्रजा को समाज को पुत्र की भांती समझती थी। नदी और समुद्र से परदेश व्यापार किया जाता था। निष्क नामक चलन अर्थव्यवस्था व्यवस्था में था और समाज में संतुलन रखने हेतु अर्थशास्त्र, कामशास्त्र से लेकर युद्धशास्र, नीतिशास्त्र ई. का अध्ययन अध्यापन गुरुकुलोंमें श्रेष्ठ आचार्यों द्वारा कराया जाता था।
ऋग्वेद (क्र. १०-१९१-४) में जो वर्णन है वह इस वेद में आए मंत्र, ऋचा और कथाओं का सार है। आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक जीवन से समाज को शांति के मार्ग पर ले जाकर भेदाभाव रहित समाजसंस्था का निर्माण किया गया होगा यह समझने लायक है।

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Thought by Swami Vivekananda

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