चातुर्वर्ण्यं मयासृष्टं गुणकर्म विभागश:...
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि चार वर्ण - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र (ज्ञान, शक्ति, व्यवहार और सेवा) यह सब व्यक्ति के गुण और कर्म के आधार पर होता है। व्यक्ति जो काम कर के जीवन यापन करता था वही काम उसकी जाती बनती थी। जैसे कपडे सिलनेवाला दर्जी, कुंभ बनाने वाला कुंम्हार, सोने के आभूषण बनाने वाला सुनार ई।
उदाहरण -
1• विश्वामित्र ॠषि पहले विश्वसेन राजा थे, बाद में तप और ज्ञान की आराधना करके और सदाचार के गुणों को धारण कर के ब्राह्मण बने।
2• वाल्मीकि ॠषि पहले डाकू थे बाद में तप और ज्ञान से ॠषि बनें।
3• रावण ॠषि पुत्र था, ब्राह्मण था लेकिन गुण और कर्म के आधार पर राक्षस ही कहलाया और आज भी उसके पुतले को दशहरे के दिन फूंका जाता है।
4• मतंग ॠषि भी भील जाती के थे और शबरी उनकी शिष्या थी परंतु मतंग ॠषि अपने गुण और कर्म के आधार पर ॠषि कहलाये।
5• सत्यकाम जाबाल ॠषि जिन्होंने उपनिषद लिखा वे तो वेश्या पुत्र थे और पिता के बारे में कुछ पता नही था फिर भी गुण और कर्म के आधार पर ॠषि कहलाये।
बाद में समय परिवर्तन से वर्ण और जाती में जो भेद है वह कोई समझ नहीं पाया।
ऐसे न जाने कितने ही उदाहरण है जिसे लोग समझते तो है लेकिन जीवन में लाना नहीं चाहते। और समाज में द्वेष फैला कर रख दिया है।
- आशुतोष
इस मेसेज से अन्य बंधुओं को भेजकर लोक जागृति लाएं और समाज को समझदार और श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करें।
Comments
Post a Comment