जहां हम जन्म लेते है वहां की संस्कृति ही वास्तविक जीवन है।
जन्म लिया है भारत में परंतु संस्कृति का पालन हो रहा है किसी और प्रदेश का तो वैचारिक वैमनस्य, भेदभाव और टकराव उत्पन्न होना ही है।
'ईश्वर है ही नहीं, है तो अल्लाह ही' - ला इलाह इल्ललाह - अब इस वाक्य को गौर से समझने की कोशिश करें तो पता चलेगा की अद्वितीय की बात ही नहीं है। यह वाक्य तो ईश्वर के अस्तित्व को ही मना कर रहा है। यह तो हम समझ रहें है क्योंकि ईश्वर को समझने के हमारे अपने तरीके है।
इस बात को और समझते हैं -
जैसे अजान देते है तब
१. अल्लाह सबसे बडा है।
२. अल्लाह के सिवाय और कोई भी पूजने योग्य नहीं है ऐसी मैं गवाही देता हूँ।
३. अल्लाह के प्रेषित (संदेष्टा) मोहम्मद है ऐसी मैं गवाही देता हूँ।
४. आओ नमाज करे लिए।
५. नमाज निंद से बेहतर है।
अब जन्म लिया है ऐसे देश में जहां की अनंतकाल से संस्कृति रही हो कण कण में ईश्वर की भावना रखने की, जहाँ पत्थर, पेड, पशु, नदी, पर्वत और प्रतिमाएं तथा माता, पिता, गुरु इन सबमें ईश्वर बुद्धि रखी जाती हो और दिन में पांच बार मस्तिष्क में यह बात अजान के माध्यम से डाली जाती रही हो कि अल्लाह के सिवाय कोई पूजनीय नही है तो वह व्यक्ति आपके ईश्वर का सम्मान कैसे करेगा?
अगर वह आपके ईश्वर का सम्मान कर भी रहा है तो भी अल्लाह का ईमानवाला कैसे हो सकता है? अगर नहीं करें तो वैचारिक मतभेद कभी न कभी तो सामाजिक मतभेद बनेंगे ही।
अब उन्हें यह भी नहीं समझा सकतें कि आपका अल्लाह और हमारा परमात्मा एक ही है। ईश्वर अल्लाह तेरो नाम हम गाते हैं परंतु कितने लोग सच में मानते है? जब ईश्वर है ही नहीं अल्लाह के सिवाय तो दोनों को कैसे कहा जा सकता है?
स्वयं के उद्धार और शांति की इच्छा रखनेवाले के लिए जहां जन्म लिया हो वहां की संस्कृति ही परम हितैषी है।
भारतीय संस्कृति तो पृथ्वी को माता मानती है और सभी जीवों, पशु-पक्षियों और मानवजाति को एक कुटुंब मानती है। इसीलिए सर्वमान्य है क्योंकि इसमें साकार और निराकार ईश्वर की उपासना मान्य है। अगर कोई ईश्वर को नही मानता तो उसकी मान्यता भी स्विकार करनेवाली उदारता से परिपूर्ण संस्कृति है भारतीय संस्कृति।
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