एक गुरुजी के दो शिष्यो में जिज्ञासा हुई कि श्रेष्ठ क्या है और उसे कैसे प्राप्त करें।
गुरुजी से उन्होंने प्रश्न किया और गुरुजी ने कहा कि आप ही श्रेष्ठ हो, आपको उसे अपने आपमें खोजना है।
दोनो शिष्योंमें जो शांत और समझदार था उसने सोचा कि अगर मैं ही श्रेष्ठ हूं तो फिर मैं क्या हूं? क्या यह शरीर हूं?
बस ऐसे ही दूसरे शिष्यने सोचा जो चंचल और अशांत था। अब कुछ दिन बाद खुब चिंतन मनन करने के पश्चात पहले शिष्य को जो शांत और समझदार था उसे ज्ञात हुआ कि वह गलत सोच में था। वह शरीर नही है, शरीर तो इच्छा के अनुसार भी नही चलता, कभी बिमार हो जाता है, कभी थक जाता है और तो और अगर शरीर श्रेष्ठ होता तो मैला भी न होता न ही शरीर से पसीना मलमूत्र आदि बनते। उसने फिर गुरुजी से प्रश्न पुछा कि मैं शरीर तो नहीं हूं तो मैं कौन हूं?
गुरुजी समझ गये कि अब ये श्रेष्ठ की ओर बढता जायेगा यह सोचते हुए कहा कि 'तुम्हे ही खोजना पडेगा कि तुम कौन हो।
दूसरा शिष्य तो अपने आप को शरीर मानकर शरीर पुष्ट करने लगा। न अधिक चिंतन सोच विचार स्वाध्याय कुछ भी न करता बस स्वयं के शरीर को श्रेष्ठ मानकर उद्दंड बनता चला।
पहला शिष्य इसी अभ्यास से आत्मज्ञान को प्राप्त कर श्रेष्ठत्व के मार्ग पर आगे बढा।
दूसरा शरीर की और शरीर से जुडी सारी आसक्तियों में फंसकर संसार में अशांत रहने लगा एवं अशांति फैलाने लगा।
दो रास्ते है... एक रास्ता है देवोंका और दूसरा है दानवोंका।
सोच के देखो कि हम किस रास्ते हैं और देवोंका रास्ता स्वयंको एवं सभी को श्रेष्ठत्व की ओर ले जायेगा। दानवोंका रास्ता दुख, पीडा, आतंक और विनाश की ओर ले जायेगा।
बस ऐसे ही दूसरे शिष्यने सोचा जो चंचल और अशांत था। अब कुछ दिन बाद खुब चिंतन मनन करने के पश्चात पहले शिष्य को जो शांत और समझदार था उसे ज्ञात हुआ कि वह गलत सोच में था। वह शरीर नही है, शरीर तो इच्छा के अनुसार भी नही चलता, कभी बिमार हो जाता है, कभी थक जाता है और तो और अगर शरीर श्रेष्ठ होता तो मैला भी न होता न ही शरीर से पसीना मलमूत्र आदि बनते। उसने फिर गुरुजी से प्रश्न पुछा कि मैं शरीर तो नहीं हूं तो मैं कौन हूं?
गुरुजी समझ गये कि अब ये श्रेष्ठ की ओर बढता जायेगा यह सोचते हुए कहा कि 'तुम्हे ही खोजना पडेगा कि तुम कौन हो।
दूसरा शिष्य तो अपने आप को शरीर मानकर शरीर पुष्ट करने लगा। न अधिक चिंतन सोच विचार स्वाध्याय कुछ भी न करता बस स्वयं के शरीर को श्रेष्ठ मानकर उद्दंड बनता चला।
पहला शिष्य इसी अभ्यास से आत्मज्ञान को प्राप्त कर श्रेष्ठत्व के मार्ग पर आगे बढा।
दूसरा शरीर की और शरीर से जुडी सारी आसक्तियों में फंसकर संसार में अशांत रहने लगा एवं अशांति फैलाने लगा।
दो रास्ते है... एक रास्ता है देवोंका और दूसरा है दानवोंका।
सोच के देखो कि हम किस रास्ते हैं और देवोंका रास्ता स्वयंको एवं सभी को श्रेष्ठत्व की ओर ले जायेगा। दानवोंका रास्ता दुख, पीडा, आतंक और विनाश की ओर ले जायेगा।

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