कुछ बातें शिवपुराण से जो आज के समयमें हमें सत्य से अवगत कराती है। वेद, पुराण, उपनिषद इत्यादि ग्रंथोमें से मनुष्य जीवन को सुसंवादित और श्रेष्ठ बनाने के उपाय ज्ञानी लोग खोजते रहते है और आधुनिक युग के अनुसार मार्गदर्शन भी करते रहते हैं।
शिवपुराण के विद्येश्वरसंहितामें आता है कि ,"घोर कलियुग आनेपर मनुष्य पुण्यकर्मसे दूर रहेंगे, दुराचारमें फँस जायेंगे और सब-के-सब सत्य-भाषणसे मुँह फेर लेंगे, दूसरोंकी निन्दामें तत्पर होंगे"
अगर आजकल के आसपास के लोगोंके लक्षण देखेंगे तो लगता है कि कलियुग का वर्णन कितनी सटिकतासे हमारे ग्रंथोंमें किया गया है।
प्रतियोगिता के इस माहौलमें जहां औद्योगिकरण और व्यापारीकरण हर क्षेत्रमें बढता जा रहा है, हर कोई हर संभव अपने व्यक्तिगत लाभके लिए अनैतिक रास्ता भी अपनाने को भी संकोच नही करता। सत्य के पथ पर चलना बडा कठिन प्रतित होता है और फिर भी कोई कोई सज्जन सत्य की राह पर चलते है तो उनका उपहास और विरोध किया जाता है। राजनैतिक दल तो मानो सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे की निंदा करके ही अपना अस्तित्व बचा सकते है।
दुराचारकी बात क्या करें, मांस मदिरा जिसे कभी घिनौना माना जाता था। असुरोंका भोजन माना जाता था उसे आज सामुहिक तौर पर पार्टियो का आयोजन करके सबके साथ सबको खाया खिलाया जाता है।
"कलियुग के लोग शरीरको ही आत्मा समझेंगे।" बात बिलकुल सही है, शरीर को सजानेमें खिलाने पिलाने तथा समस्त भोग भोगनेमें ही लोग लगे है। आत्मा के विषयमें कोई जिज्ञासा नही; न कोई प्रयत्न। कोई कोई बिरले ही होते है जो ईश्वर, आत्मा एवं परमात्मा के प्रति जिज्ञासा, भक्ति तथा योग का अवलंबन करते है। पति पत्नी का रिश्ता शरीर के भोग और एक दुसरे के आकर्षण के समझौतोसे भरा होता जा रहा है। दोनो एक दूसरे के लिए श्रेष्ठ गृहस्थाश्रम बने ऐसा सोच भी नही सकते, संयमहीन तथा एक दूसरे के गुलाम बनना ही आदर्श मानने लगे। गृहस्थाश्रम की संकल्पना भोगवादी बन चुकी है। आत्मा और परमात्मा के विषयमें न कोई रस है, न कोई प्रयत्न। शरीर से सुख भोगने की इच्छा, पांच इन्द्रियों से ही सुख प्राप्त करने का प्रयास, यह सब शरीर को ही आत्मा मानने से हो रहा है।
कलियुग के मनुष्योंके बारेमे यह भी कहा कि यदि धनी हुए तो कुकर्ममें लग जाएंगे। विद्वान् हुए तो वाद-विवाद करनेवाले होंगे। समस्त वर्णोंको अपने संपर्कसे भ्रष्ट करेंगे।
धन आया तो धन का अभिमान भी आया, कोई कितनी ही चाहे अच्छी बात कहे लेकिन धन का अभिमान सुनने नही देगा। धनसे सुख भोगने के चक्कर में कुकर्म के रास्ते चढ जाऐंगे।
स्त्रियोंका व्यवहार भी भयसे रहित कुत्सित हाव-भावयुक्त तथा सदाचार से भ्रष्ट होगा। जिन स्त्रियोंमें शालिनता एवं संस्कार दिखाई दे उन्हे इस युग में साक्षात देवी ही समझना चाहिए।
टीवी, सिनेमा की एक्ट्रेस को पता होता है कि मेरा अभिनय और मेरी मर्यादा सबकुछ लोग देख रहे हैं फिर मर्यादा छोड कुछ न कुछ अभद्र कर ही देती है। इंटरनेट के माध्यम से न जाने कितनी अश्लीलता फैल चुकी है अब इसका परिणाम श्रेष्ठ कैसे आएगा भला?
शिवपुराण भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का एवं वेदांतवेद्य सद्वस्तु का विशेषरूपसे वर्णन है और यही मनुष्य के उद्धार का साधन है।
ईश्वर का साक्षात्कार भक्तिसे ही होता है। दूसरे किसी उपायसे कहीं इनका दर्शन नहीं होता।
भक्ति और प्रेम में थोडा अंतर है, प्रेममें स्वार्थ छुपा होता है, आकर्षण होता है, प्रेम अंधा भी होता है। लेकिन भक्ति कभी स्वार्थी नही बनाती, भक्ति अंतर की लघुता को विशालता की ओर ले जाती है। भक्ति कभीभी अंध नही होती। प्रेमसे भी उपर भक्ति है। प्रेममें प्रेमी और प्रेमिका होते है किंतु भक्ति में भक्त और भगवान।
ज्ञान भी दो प्रकार का होता है एक जिससे हम पैसा धन घर इत्यादि का प्रबंध करते है और दूसरा जो हमारे व्यक्तित्व को मनुष्य बनाकर देवत्व की ओर ले जाता है। लौकिक और अध्यात्मिक ये दोनो ही आवश्यक है। लौकिक ज्ञान घमंड अहंकार बढाएगा, अध्यात्मिक ज्ञान आत्मा का बोध करा देगा।
वैराग्य इस शब्द को लोग सिर्फ साधुसंतो के लिए बना शब्द मानते है। राग मतलब आसक्ति ये तो सब जानते है किंतु आसक्ति को अनासक्ती बनाने; एवं ऐसा करने में भी आसक्त न होने का अभ्यास ही वैराग्य है। त्याग करते करते त्याग करने का स्वभाव बन जाना और उस स्वभाव की आसक्ति हो जाना भी कोई वैराग्य कैसे हो सकता है। आसक्ति अगर आसक्ति छुडानेवाले में हो जाए, तो वही भक्ति बन वैराग्य का रास्ता दिखा देती है। भगवानके अस्तित्व का बोध करानेवाला श्रेष्ठ साधन मार्ग में वही लोग चल पडते है जो मनुष्य जीवन को सार्थक बनाना चाहते है।
कानसे भगवानके नाम-गुण और लिलाओंका श्रवण, वाणीद्वारा उनका किर्तन तथा मनके द्वारा उनका मनन - इन तिनोंको महान साधन कहा गया है।
श्रोत्रेण श्रवणं तस्य वचसा कीर्तनं तथा। मनसा मननं तस्य महासाधनमुच्यते।।
लोग प्रत्यक्ष वस्तुको आँखसे देखकर उसमें प्रवृत्त होते हैं। परंतु जिस वस्तुका कहीं भी प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता, उसे श्रवणेन्द्रियद्वारा जान-सुनकर मनुष्य उसकी प्राप्तिके लिए चेष्टा करता है। इंद्रियोंसे जो परे है उसके लिए तो वही चेष्टाएं करनी पडेगी जो हमें इंद्रिय सुख-दुखो से परे ले जाए।
शिवपुराण की कथाएं एवं ज्ञानवर्धक बातें मन, बुद्धि को आंदोलित कर देवत्व का अनुभव करा देती है। स्वच्छ निर्मल मन और समर्पण में असीम सामर्थ्य है।
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